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Saturday, 21 November 2015

यात्रा तुंगनाथ की--------भाग पहला

आओ चले भोले नाथ के एक और धाम तुंगनाथ। इस यात्रा का प्रोग्राम एकदम से बैठे बैठाये बन गया। इस यात्रा को मैंने एक ऐसे दोस्त रविंदर के साथ पूरी की, जिस के साथ मैंने अपनी 99 % यात्राएं बाइक पर की हैं। रविंदर मेरा स्कूल टाइम से एक अच्छा दोस्त है। एक दिन बैठे बैठे हमारा प्रोग्राम बन गया कही बाइक पर घूम कर आएं। मैंने उसे तुंगनाथ के बारे में बताया। क्यों कि एक साल पहले ही मैं केदारनाथ गया था। उस समय मेरा तुंगनाथ जाना रह गया था, दूसरा हमारे पास सिर्फ तीन दिन ही थे। इस लिए हम ने सिर्फ तुंगनाथ का प्रोग्राम बनाया। तीसरा भोलेनाथ का ही कोई ना कोई धाम जाना ही था।   
   
बस मैंने अपने एक दोस्त का बाइक उधार लिया और हम 29 अप्रैल 2012 दिन रविवार को दोपहर 1.30 के करीब पटियाला से निकले। पटियाला में हम ने सब से पहले भोलेनाथ के तुंगनाथ मंदिर में माथा टेका। फिर हम ने अपनी यात्रा शुरू की। आज हमारा प्लान रात को ऋषिकेश रुकने का था और अगले दिन सोमवार वाले दिन तुंगनाथ मंदिर में भोलेनाथ के दर्शन करने का था।
हम लोग रात को आठ बजे के करीब हरिद्वार पहुँच गए। कुछ देर रुक कर हम ऋषिकेश के लिए रवाना हो गए। ऋषिकेश पहुँच कर अचानक मैंने रविंदर को कहा चलो रात को सफर करते हैं। पर जहाँ तक मुझे पता था, रात को ऋषिकेश से आगे जाने नहीं देते और रात को कोई भी बस और व्हीकल नहीं चलता वहाँ। हम ने ऋषिकेश में ही एक दूकानदार से आगे जाने के बारे में पूछा, उस ने भी आगे जाने के लिए मना कर दिया। लेकिन हमारे मन में रात का सफर करने का जूनून था। हम ने ज्यादातर सफर पहले भी रात को किये हैं। हम ने सोच लिया अगर हमें आगे रोका गया तो बोल देंगे हम ने शिवपुरी तक जाना है। बस उस के बाद रात को ही तुंगनाथ के लिए निकल पड़े। चेक पोस्ट पर उस समय कोई नहीं था। हम आराम से वहाँ से निकल गए।

आगे रास्ते में अँधेरा और सन्नाटा था। रात के अँधेरे में हम तीन जन (मैं,रविंदर और हमारी बाइक) आगे बढ़ते जा रहे थे। दूर दूर तक सड़क पर कोई भी गाडी नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे हम ही इन पहाड़ों के मालिक हो। हम लोगों ने दोपहर के बाद से कुछ नहीं खाया था और अगले दिन हम दोनों का सोमवार का व्रत भी था। हम ने निश्चय किया कि आगे अगर कोई छोटी से दुकान भी खुली होगी तो कुछ खा पी लेंगे। सवा घंटे बाइक चलाने के बाद हमें सड़क के किनारे छोटी सी दुकान खुली हुई मिली। एक दो ट्रक भी खड़े थे। दूकानदार से खाने के बारे में पूछा तो उस ने कहा मिल जायेगा। बस फिर क्या था हम फटाफट खाने के लिए बैठ गए। खाने के बाद चाय पी गई और आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान किया। जैसे जैसे हम ऊंचाई पर जा रहे थे ठण्ड बढ़ती जा रही थी।

काफी देर बाद हम श्रीनगर पहुंचे। ऋषिकेश से श्रीनगर का रास्ता 115 कि.मी. का है। अब ठण्ड भी सहन नहीं हो रही थी। श्रीनगर मार्किट में पहुँच कर हम ने बाइक को एक बैंक के एटीएम के पास रोका और अपने बैग से फुल स्लीव की टी शर्ट निकल कर पहन ली। हम अपने साथ कोई जैकेट और स्वेटर नहीं ले कर आये थे। इतने में एक पुलिस वाला हमारे पास आया और रौब से हमें कहने लगा तुम एटीएम लूटने आये हो। उस भलेमानस को समझाया हम एटीएम लूटने वाले नहीं हम तो भोलेनाथ के दर पर जा रहे हैं। समझाने के बाद वो चला गए। हम भी अपनी मंजिल की और चल दिए। सुबह के 2.30 बजे के करीब थकावट के कारण नींद आनी शुरू हो गई थी। पिछले 12 घंटों से हम बाइक चला रहे थे और ठण्ड भी लग रही थी। रास्ते में एक जगह (जगह का नाम अब याद नहीं) एक हलवाई की दुकान का शटर आधा खुला था। हम ने बाइक रोकी और सीधा दुकान में चले गए। वहाँ पर एक आदमी बैठा था। हम ने उसे चाय के लिए पूछा पर दूध ना होने के कारण चाय बन ना सकी। हम ने वही थोड़ी देर सुस्ताने के लिए पूछा उस के लिए उस ने हामी भर दी। पर दुकान पर सारा सामान समेटे होने  वजह से लेटने के लिए जगह नहीं थी। तभी उस आदमी ने कहा दुकान के सामने पहाड़ी से 10 कदम नीचे एक कमरा है अगर चाहो तो वहाँ आराम कर सकते हो। हम दोनों ने झट से कमरे में चलने के लिए कहा। कमरा छोटा सा था। फर्श पर टाट बिछा हुआ था। हम दोनो टाट पर लेट गए। लेटते ही हमें नींद आ गई। 2 घंटे बाद मेरी नींद खुली, मैंने रविंदर को उठाया और चलने को कहा। हम कमरे से बाहर आ गए और उस आदमी के पास दुकान पर पहुंचे। हम ने उसे पैसों के बारे में पूछा तो उस ने पैसे लेने से मना कर दिया। पर हम ने जबरदस्ती फिर भी उसे 100 रुपए दे दिए। पर्यटन और घुमक्कड़ी में यही फर्क है। पर्यटन में जहाँ आप होटल के कमरे के बिना रात नहीं गुजारते, वही घुमक्कड़ी में आप कही भी प्रकृति की गोद में या कही भी जगह मिले सो सकते हों। वो नींद होटल के कमरे की नींद से ज्यादा मीठी होती है।

फ्रेश होने के बाद हम वहाँ से 5.30 बजे के करीब चल दिए। कुछ देर नींद लेने के बाद थकावट उतर गई थी। आगे बढ़ते हुए सूरज देवता भी प्रगट हो गए थे। मौसम में अब ठंडक खत्म हो गई थी। 9 बजे के करीब रास्ते में एक जगह सड़क के किनारे पाइप से पानी आ रहा था। मैंने और रविंदर ने नहाने का फैसला किया। बस फिर क्या था, सड़क के किनारे बाइक खड़ा कर कपडे उतार कर वही नहाने का आनंद लिया गया। उस के बाद हम उखीमठ के लिए प्रस्थान कर गए। दस बजे के करीब हम उखीमठ पहुँच गए। ऋषिकेश से उखीमठ 190 कि.मी के  करीब है। 

उखीमठ के बारे में 

उखीमठ रुद्रप्रयाग जिले की एक पवित्र जगह है। जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई 4300 फ़ीट है। माना जाता है कि इस जगह का यह नाम बाणासुर की बेटी उषा से उत्पन हुआ है। मान्यताओं के अनुसार उखीमठ का प्रारम्भिक नाम उषामठ था, जो बाद में बदलकर उखीमठ हो गया। यह जगह कई हिन्दू देवी देवताओं के मंदिरों जैसे उषा, शिव, अनिरुद्ध, पार्वती और मांधाता मंदिर की यात्रा का अवसर प्रदान करता है। उखीमठ को सर्दियों के मौसम के दौरान भगवान केदारनाथ के निवास स्थान के रूप में जाना जाता है। सर्दियों में भगवान केदारनाथ की पूजा अर्चना उखीमठ में ही होती है। इस मंदिर में भगवान शिव की बड़ी खूबसूरती से तैयार की गई मूर्ति प्रतिष्ठित है। मंदिर की वास्तुकला पर दक्षिण भारतीय स्थापत्य का प्रभाव है, जो इस ओर शंकराचार्य तथा उनके अनुवर्ती दक्षिणतों के साथ आया था।

यह स्थान राजा बलि के प्रतापी पुत्र बाणासुर की राजधानी थी। वह शिव भक्त था। यही पर राजा मान्धाता ने शिव आराधना की थी। राजा बाणासुर की पुत्री उषा जो कृष्ण के पोत्र अनिरुद्ध को स्वप्पन में देख कर आकृष्ट हो गई थी, को उसकी मित्र चित्र लेखा जो बाणासुर के प्रधान मंत्री की पुत्री थी व वह महायोगिनी थी। अपनी सखी की प्रसन्नता हेतु अपने योग बल से द्वारिका से अनिरुद्ध को उठाकर शोणितपुर उखीमठ का प्राचीन नाम बाणासुर की राजधानी में ले आई। उषा अनिरुद्ध के साथ आराम से रहने लगी। जब इस का पता राज कर्मचारियों का लगा तो बाणासुर तक यह बात पहुंचाई। बाणासुर ने अनिरुद्ध को बंदी बना लिया। कुछ काल पश्चात नारद जी ने यह समाचार द्वारिकाधीश कृष्ण जी को दिया तो सेना समेत शोणितपुर आये एवं भगवान शिव के साथ युद्ध हुआ। बाणासुर की पराजय के बाद उषा एवं अनिरुद्ध का विवाह यही हुआ। विवाह की वेदी एवं तोरण आदि के चिन्ह अभी भी यहाँ पर मौजूद हैं।  

उखीमठ के बारे में कुछ अनजाने पहलु, शायद आप जानते हों। 

1. भगवन शिव ने मान्धाता को ओमकार रूप में दर्शन दिए। 
2. मोराली नाम के स्थान पर बाणासुर के भाई दानासुर का मंदिर है। जनश्रुति है कि इन्द्र आज भी इनका कहना मानते हैं, जिसकी मूर्ति बाहर निकलने पर बारिश आ जाती है। 
3. मंदिर में एक मसान बार है जिसे भूतों से छिना गया है (जनश्रुति)
4. मंदिर के सामने जहाँ पर पानी का नल है उस के निचे जल कुण्ड हुआ करते थे। 
5. दयानंद सरस्वती ने कुछ समय उखीमठ में बिताया था। 
6. मंदिर नागर शैली में बना है जो की 32 कोनो से निर्मित है, ये अपने आप में पुरातन कला का बेजोड़ उदारहण है। 
7. उखीमठ का नाम पहले उषामठ था जो बाद में उखामाथ और फिर उखीमठ हो गया। 
8. प्राचीन काल में उखीमठ के रावल को दंड देने का अधिकार था। जिस में वह दोषी व्यक्ति को छोटे दंड में ताली पटपद्या नाम की जगह मजदूरी के लिए भेज देते थे। 
9. कृष्ण जी से युद्ध करते समय बाणासुर के पुकारने पर भगवान शिव भोलेस्वर में अवतरित हुए थे। 
10.  वैदिक इतिहास में स्त्री द्वारा पुरष का हरण (उषा के कहने पर ही चित्र लेखा ने अनिरुद्ध को द्वारका से उठाया था)

अगली पोस्ट में तुंगनाथ मंदिर के दर्शन


पटियाला में तुंगनाथ मंदिर 

रास्ते में भोलेनाथ की मूर्ति 








रास्ते में नहाते हुए 


उखीमठ में मैं और रविंदर 

मंदिर प्रांगण 




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