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Saturday, 5 December 2015

यात्रा तुंगनाथ केदार ----भाग दूसरा

उखीमठ से 10.30 बजे के करीब हम तुंगनाथ के लिए निकल पड़े। उखीमठ से 35 कि.मी. की दुरी पर चोपता नामक स्थान है।

चोपता के बारे में 

चोपता एक ऐसी खूबसूरत जगह है, जहाँ पहुँच कर मन को शांति और विश्राम मिलता है। चोपता को गाँव और कस्बे में से किसी खाँचे में नहीं डाल सकते। यह सिर्फ एक पड़ाव है, जहाँ केदारनाथ और बद्रीनाथ के बीच चलने वाली गाड़ियाँ सुस्ताने के लिए रूकती हैं। यह एक छोटा सा ऐसा स्थान है, जहाँ की सुन्दरता किसी साँचे में कैद किसी तस्वीर जैसी लगती है। यह किसी दूसरी दुनिया यानि धरती पर स्वर्ग जैसा एहसास कराती है। मनोरम दृश्य वाला यह स्थल भीड़भाड़ से दूर शांति और सुकून देने वाला प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यह स्थान घने जंगलों से गिरा हुआ है। 

जनवरी-फरवरी के महीनों में आमतौर पर बर्फ की चादर ओढ़े इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में देखते ही बनती है। इन महीनों में यहां मीलों तक फैले मखमली घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता देखने लायक होती है। इसीलिए अनुभवी पर्यटक इसकी तुलना स्विट्जरलैंड से करने में भी नहीं हिचकते। सबसे खास बात ये है कि पूरे गढ़वाल क्षेत्र में या अकेला क्षेत्र है जहां बस द्वारा बुग्यालों (ऊंचाई वाले स्थानों पर मीलों तक फैले घास के मैदान) की दुनिया में सीधे प्रवेश किया जा सकता है। यानि यह असाधारण क्षेत्र श्रद्धालुओं और सैलानियों की साधारण पहुंच में है। ऋषिकेश से गोपेश्वर या फिर ऋषिकेश से ऊखीमठ होकर यहां पहुंचा जा सकता है। ये दोनों स्थान बेहतर सड़क मार्ग से जुड़े हुए है।

हम तीनो चोपता के सुन्दर रास्तों से जा रहे थे और इस की सुंदरता को निहारते जा रहे थे। लोग पता नहीं क्यों खजियार को मिनी स्विट्ज़रलैंड कहते हैं। मुझे तो खजियार से ज्यादा सुंदरता चोपता में नजर आती है। आगे जाने पर बारिश शुरू हो गई। हम इस हल्की बारिश में आगे बढ़ते जा रहे थे। पहाड़ियों पर बर्फ नजर आ रही थी। जिस को देख कर मैंने रविंदर से कहा काश बर्फ भी गिरनी शुरू हो जाये। खैर हम बढ़ते बढ़ते चोपता की छोटी सी मार्किट पहुँचे। जहाँ पर खाने को दो तीन ढाबे और टिन की छत वाले कमरों को आप चाहें तो गेस्ट हाउस कह सकते है, वहाँ पर बने हुए हैं। गर्मियों में भी यहां कड़ाके की ठंड पड़ती है। बारिश भी बिन-बुलाए मेहमान की तरह अचानक ही आकर सराबोर कर जाती है। ऊखीमठ से सिर्फ 35 किलोमीटर दूर होने के बावजूद वहां बिजली अब तक नहीं पहुंची। गेस्ट हाउसों में कमरों को रोशन करने के लिए सोलर पैनल लगे हैं। सूरज ठीक-ठाक निकल गया तो एक इमरजेंसी लाइट चार-पांच घंटों तक जल जाती है। अगर रात को कुछ पढ़ने या लिखने की तबीयत कर जाए तो मोमबत्ती का ही सहारा है। समुद्र तल से 12074 फुट ऊंचे तुंगनाथ तक पहुंचने के लिए चोपता से चार किलोमीटर तक खड़ी चढ़ाई है।

बारिश धीरे धीरे अभी भी हो रही थी। मैंने और रविंदर ने यहाँ से प्लास्टिक वाली पन्नी ले ली बारिश से बचने के लिए और एक एक माज़ा की बोतल रास्ते के लिए। यहाँ से आप घोड़े भी ले सकते हों चढाई के लिए। जहाँ से चढाई शुरू होती है वहाँ एक गोल सा गेट है और घंटा लगा हुआ है। हम ने भोलेनाथ को  नमस्कार कर लगभग 1 बजे चढाई शुरू कर दी। अभी हम ने थोड़ी दूर ही चढाई चढ़ी थी। अचानक बारिश की जगह बर्फ गिरने लगी। बर्फ देख कर मन प्रफुलित हो गया। शायद भोलेनाथ ने हमारी ख़्वाहिश सुन ली थी। मैंने और रविंदर ने पहली बार बर्फ गिरती देखी थी। अब हम दुगने जोश से चढाई चढ़ने लगे। चढाई एक दम खड़ी थी। आगे जाने पर साँस फूलने लगी। लेकिन आस पास के दिलकश नज़ारे आप को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं बर्फ से ढंकी केदारनाथ और चौखंभा की चोटियां  इस सफर में समूचे रास्ते साथ होती हैं। कुछ और आगे बढ़ने पर बर्फ गिरनी बंद हो गई थी। एक ऊंचाई तक पहुंचते ही पेड़ अचानक गायब हो जाते हैं। बोर्ड तो नहीं लगा, मगर लगता है जैसे कुदरत ने फरमान जारी कर दिया हो—इस लकीर के आगे कोई पेड़ नहीं होगा। इसके आगे सिर्फ सब्ज घास फैली है, जिस पर इधर-उधर चट्टानें और झाड़ियां हैं।

जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे थे। आस पास रास्ते में बर्फ भी बढ़ती जा रही थी। कुदरत की इस अनमोल सुंदरता के आगे हम अपनी थकान को भूल गए थे। आस पास की सारी पहाड़ियाँ बर्फ से ढकी हुई थी। प्रकृति को निहारते हुए हम 4 बजे के करीब हम तुंगनाथ मंदिर पहुँच गए।  मंदिर को जाने वाली सीढ़ियां बर्फ से ढकी हुई थी। मंदिर में पहुँच कर हम ने थोड़ा सा आराम किया फिर मंदिर में माथा टेकने चल दिए।  मंदिर प्रांगण में बर्फ ही बर्फ थी। हम ने किसी तरह जूते उतारे। ठण्ड और बर्फ के कारण हमारे पैर सुन्न हो रहे थे। मंदिर में माथा टेक कर हम बाहर आये। तुंगनाथ में पत्थर के खूबसूरत मंदिर के दरवाजे पर शिव की सवारी नंदी जी खड़े हैं। अंदर स्वयंभू भुजा के प्रतीक के तौर पर एक पत्थर है। किंवदंतियों के अनुसार विष्णु ने इसी जगह तपस्या के बाद सुदर्शन चक्र हासिल किया था। इस छोटे-से मंदिर परिसर में शिव के अलग-अलग रूपों और उनके समूचे परिवार की मूर्तियां हैं।  
ये फोटो मेरे द्वारा नहीं खींची गई है। 

तुंगनाथ मंदिर के बारे में 

तुंगनाथ उत्तराखण्ड के गढ़वाल के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित एक पर्वत है। तुंगनाथ पर्वत पर स्थित है तुंगनाथ मंदिर, जो 3680 मीटर की ऊँचाई पर बना हुआ है और पंच केदारों में सबसे ऊँचाई पर स्थित है। यह मंदिर 1000 वर्ष पुराना माना जाता है और यहाँ भगवान शिव की पंच केदारों में से एक के रूप में पूजा होती है। ऐसा माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण पाण्डवों द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया गया था, जो कुरुक्षेत्र में हुए नरसंहार के कारण पाण्डवों से रुष्ट थे।
इस मंदिर के विषय से जुडी एक मान्यता प्रसिद्ध है। कि यहां पर शिव के ह्रदय और बाहों की पूजा होती है। इस मंदिर की पूजा का दायित्व यहीं के एक स्थानीय व्यक्ति को दिया गया है।

पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया।

उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतध्र्यान हुए, तो उनके धड से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए है। 

इस स्थान से एक अन्य कथा जुडी हुई है कि भगवान राम से रावण का वध करने के बद ब्रह्माहत्या शाप से मुक्ति पाने के लिये उन्होनें यहां पर शिव की तपस्या की थी। तभी से इस स्थान का नाम चंद्रशिला भी प्रसिद्ध है। यहां से बद्रीनाथ, नीळकंठ, पंचचूली, सप्तचूली, बंदरपूंछ, हाथी पर्वत, गंगोत्री व यमनोत्री के दर्शन भी होते है। 

रात को हम ने वही रहने का प्लान किया। हमारे पास जैकेट और स्वेटर ना होने के कारण हमें ठण्ड लग रही थी। हम ने 250 रुपए में एक छोटा सा कमरा लिया। जिस में पाँच-छह कंबल थे। कंबल भी ठण्ड की वजह से गीले थे। खैर किसी तरह हम ने ठण्ड में रात गुजारी। सुबह हम 6 बजे उठ गए। कमरे के बाहर आ कर देखा तो नजारा बेहद आकर्षक था। रात को आस पास की पहाड़ियों पर और मंदिर में ताजा बर्फ गिरी थी। नहाने का तो कोई सवाल ही नहीं था। हम ने मुँह हाथ धो कर कपडे बदले। और प्रकृति के नजारों का जम कर मजा लेने लगे। सूरज की किरणे बर्फ पर मोतियों की तरह चमक रही थी। बर्फ को देखते हुए हम ने चंद्रशिला नहीं जाने का निर्णय किया। चंद्रशिला यहाँ से डेढ़ किलोमीटर था। भोलेनाथ को प्रणाम कर हम वापिस हो लिए। हम मंदिर की सीढ़ियां उतर ही रहे थे अचानक बर्फ के कारण मैं फिसल कर गिर गया। वो तो भगवान का शुक्र है कोई चोट नहीं लगी। लगभग 9.30 के करीब हम नीचे चोपता पहुँच गए। सब से पहले हम ने वहाँ पर बने ढाबे पर नाश्ता किया। क्यों कि कल से हम ने कुछ नहीं खाया था। उस के बाद हम ने अपना बाइक उठाया और वापिस हरिद्वार की तरफ चल पड़े। विजयदशमी के बाद तुंगनाथ मंदिर बंद होते ही चोपता में वीरानी छा जाती है। लगभग चार महीनों तक बर्फ की चादर ओढ़े समूचा इलाका सन्नाटे में डूबा होता है। बैसाखी के बाद तुंगनाथ के कपाट खुलने से कुछ पहले ही चोपता में रौनक लौटने लगती है। चाय की दुकानें और ढाबे सज जाते हैं और सफाई के बाद गेस्ट हाउस सैलानियों का इंतजार करने लगते हैं। एक बात और यहाँ की मशहूर है वो है मंगल सिंह की दूकान। ओस की चादर में लिपटी एक धुंधली शाम मंगल सिंह की चाय की दुकान पर गुजारे बिना चोपता की यात्रा पूरी नहीं होती। दुनिया को चोपता से वाकिफ कराने में उनका बड़ा रोल रहा है। हिमालय पर कई किताबें लिखने वाले बांग्ला के मशहूर यायावर लेखक उमा प्रसाद मुखोपाध्याय 1960 के दशक में हिमालय की अपनी पदयात्रा के दौरान 21 मर्तबा मंगल सिंह के मेहमान बने थे।


वापिसी हम गोपेश्वर से जा रहे थे। गोपेश्वर चोपता से 80-90 कि.मी. की दुरी पर है। गोपेश्वर पहुँच कर हम ने प्रसिद्ध शिव मंदिर रुद्रनाथ के दर्शन किये। इस छोटे और प्यारे से कस्बे के बाजार के बीचोबीच भगवान भोले का रुद्रनाथ मंदिर बहुत ही सुन्दर है। 12 बजे के करीब हम मंदिर के प्रांगण में थे। 20 मिनट के करीब हम ने मंदिर में गुजारे और भोले शंकर को हम नमन कर वहाँ से प्रस्थान किया। उस के बाद हम सीधे रात को ऋषिकेश जा कर रुके। रात को हम ने ऋषिकेश गुरद्वारे में कमरा ले कर रात गुजारी। सुबह जल्दी उठ कर तैयार हो हम 8 बजे ऋषिकेश घूमे। 10 बजे के करीब हम ऋषिकेश से पटियाला के लिए चल दिए और 6 बजे के करीब हम पटियाला पहुँच गए। 

इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे  
   
बर्फ से ढकी पहाड़ियां


रविंदर 

तुंगनाथ चढाई के समय बर्फ़बारी 



ट्रेकिंग के समय सुंदर दृश्य 






ट्रेकिंग करते हुए सुंदर रास्ता 




दूर तुंगनाथ मंदिर 

मंदिर से बर्फ से लदे पहाड़ों का सुन्दर दृश्य 

मंदिर को जाती हुई सीढ़ियां 


मंदिर का प्रवेश द्वार 

भोले नाथ का मंदिर 




रविंदर के पीछे दूर चौखम्भा पीक 



चोपता का छोटा सा बाजार 

गोपेश्वर में रुद्रनाथ मंदिर 








ऋषिकेश में परमार्थ आश्रम के सामने भोले की बहुत सुंदर मूर्ति 






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